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नेपाल में संसद और सुप्रीम कोर्ट जलाए गए

नेपाल में संसद और सुप्रीम कोर्ट जलाए गए

नेपाल में संसद और सुप्रीम कोर्ट जलाए गए, पीएम ओली ने इस्तीफा दिया, जनरेशन Z सड़कों पर

नेपाल में संसद और सुप्रीम कोर्ट जलाए गए

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नेपाल में संसद और सुप्रीम कोर्ट जलाए गए नेपाल आज एक बड़े राजनीतिक और सामाजिक संकट से गुजर रहा है।

राजधानी काठमांडू में हालात काबू से बाहर होते जा रहे हैं।

संसद और सुप्रीम कोर्ट की इमारतें जल चुकी हैं। प्रधानमंत्री केपी ओली ने इस्तीफा दे दिया है।

कई मंत्री और शीर्ष सरकारी अधिकारी सड़कों पर भगाए गए हैं।

मीडिया हाउस पर हमले हुए हैं। नेपाल की राजनीति में ऐसा उथल-पुथल लंबे समय बाद देखने को मिला है।

स्थिति इतनी बिगड़ चुकी है कि सेना ने भी संयम बरतने की अपील की है।

लेकिन हकीकत यह है कि हालात नियंत्रण से बाहर हैं।

अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, बीते 48 घंटों में नेपाल की राजधानी युद्धभूमि में बदल गई है।


क्यों भड़का नेपाल?

नेपाल में इस जनविरोध का केंद्र बिंदु बने हैं युवा। जिन्हें “जनरेशन जेड” कहा जा रहा है।

18 से 25 वर्ष के हजारों युवा सोशल मीडिया बैन और भ्रष्टाचार के खिलाफ सड़कों पर उतर आए।

  • नेपाल सरकार ने हाल ही में 26 सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर बैन लगा दिया था।
  • इनमें YouTube, Instagram, TikTok, Facebook, Twitter और WhatsApp शामिल थे।
  • सरकार का तर्क था कि फेक न्यूज़ और अस्थिरता रोकने के लिए यह कदम उठाया गया।
  • लेकिन आम जनता, खासकर युवाओं ने इसे अपनी आवाज दबाने की कोशिश माना।

यहीं से काठमांडू में विरोध प्रदर्शन शुरू हुए, जो धीरे-धीरे हिंसा में बदल गए।


संसद और सुप्रीम कोर्ट को आग क्यों लगाई गई?

यह सवाल सबसे अहम है। आम जनता का गुस्सा सोशल मीडिया बैन और भ्रष्टाचार से जरूर भड़का,

लेकिन संसद और सुप्रीम कोर्ट को जलाना सामान्य प्रदर्शनकारियों का काम नहीं हो सकता।

विशेषज्ञों का मानना है कि:

  • कहीं न कहीं इसमें बाहरी शक्तियों का हाथ हो सकता है।
  • नेपाल की राजनीति में लंबे समय से चीन और अमेरिका की खींचतान रही है।
  • पश्चिमी देशों को नेपाल का चीन के करीब जाना पसंद नहीं आया।
  • हाल ही में बांग्लादेश में भी इसी तरह के “कॉटन कोट रेवोल्यूशन” की बात सामने आई थी।

नेपाल का मामला भी उसी पैटर्न पर बताया जा रहा है।


“नेपो किड्स” और भ्रष्टाचार का गुस्सा

नेपाल की आम जनता का सबसे बड़ा आक्रोश भ्रष्टाचार और “नेपोटिज्म” को लेकर है।

  • सोशल मीडिया पर कई वीडियो वायरल हुए, जिनमें नेपाली नेताओं और मंत्रियों के बच्चे यूरोप और अमेरिका में ऐशो-आराम की जिंदगी जीते दिखे।
  • वहीं, नेपाल के गरीब नागरिक बाढ़ और भूकंप जैसी आपदाओं से जूझते रहे।
  • सरकारी अस्पतालों में स्थिति इतनी खराब है कि लोग बुनियादी इलाज के लिए तरसते हैं।

नेपाल की प्रति व्यक्ति जीडीपी केवल 1500 डॉलर से भी कम है। भारत 2700 डॉलर और बांग्लादेश 2500 डॉलर पर पहुंच चुका है।

इस तुलना ने लोगों में गहरी नाराजगी पैदा कर दी।

लोगों का मानना है कि नेताओं और उनके परिवारों की संपत्ति जनता के हिस्से का पैसा है, जो भ्रष्टाचार के जरिए बाहर जा रहा है।


हिंसा और मानवाधिकार उल्लंघन

अब तक के प्रदर्शन में 19 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है।

  • कई रिपोर्ट्स में कहा गया है कि पुलिस और आर्मी ने छात्रों पर लाठियां बरसाईं।
  • कुछ जगह बलात्कार और गंभीर मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप भी लगे हैं।
  • एक पूर्व प्रधानमंत्री की पत्नी गंभीर रूप से जल गई हैं।
  • बड़े नेताओं के घरों पर भी हमले हुए हैं।

हालांकि, सोशल मीडिया वापसी के बाद भी प्रदर्शन शांत नहीं हुए।


राजनीतिक अस्थिरता और अंतरराष्ट्रीय दबाव

नेपाल में राजनीतिक अस्थिरता नई बात नहीं है। लेकिन मौजूदा हालात ने इसे नई ऊंचाई पर पहुंचा दिया है।

  • केपी ओली का इस्तीफा इसके बाद की स्थिति को और पेचीदा बना देगा।
  • सवाल उठ रहा है कि अब सत्ता कौन संभालेगा।
  • क्या नेपाल में फिर से राजशाही (मोनार्की) की वापसी होगी?
  • या फिर कोई नई राजनीतिक ताकत उभरेगी?

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी नेपाल को लेकर खींचतान तेज हो गई है।

  • चीन नेपाल का बड़ा साझेदार है और हाल के वर्षों में निवेश बढ़ा चुका है।
  • अमेरिका ने नेपाल को “एमसीसी” के तहत 500 मिलियन डॉलर की सहायता देने की घोषणा की थी।
  • लेकिन डोनाल्ड ट्रंप के आने के बाद यह डील लगभग ठंडी पड़ गई।

नेपाल की स्थिति अब भू-राजनीतिक “प्रॉक्सी बैटल” जैसी हो गई है।


निवेश और अर्थव्यवस्था पर असर

नेपाल की पहले से कमजोर अर्थव्यवस्था इस राजनीतिक उथल-पुथल के बाद और कमजोर हो सकती है।

  • राजनीतिक अस्थिरता निवेशकों को डरा देती है।
  • बांग्लादेश में भी मोहम्मद यूनुस के सत्ता में आने के बाद विदेशी निवेश और जीडीपी ग्रोथ में गिरावट देखी गई।
  • नेपाल के लिए यह स्थिति और गंभीर हो सकती है क्योंकि देश पहले ही विकास की दौड़ में अपने पड़ोसियों से काफी पीछे है।

भविष्य के संभावित परिदृश्य

नेपाल के भविष्य को लेकर कई संभावनाएं बताई जा रही हैं।

  1. राजशाही की वापसी – जनता का एक वर्ग चाहता है कि फिर से राजा सत्ता में आएं।
  2. नई युवा शक्ति का उभरना – जनरेशन जेड का दबाव एक नए राजनीतिक नेतृत्व को जन्म दे सकता है।
  3. बाहरी दखल – चीन और अमेरिका दोनों नेपाल को अपने पाले में खींचने की कोशिश करेंगे।
  4. लंबे समय तक अस्थिरता – अगर कोई ठोस समाधान नहीं निकला तो नेपाल में लंबे समय तक अस्थिरता बनी रह सकती है।

भारत के लिए क्या मायने?

नेपाल की स्थिति भारत के लिए भी महत्वपूर्ण है।

  • भारत और नेपाल के बीच खुली सीमा है।
  • नेपाल में अस्थिरता का असर सीधे भारत के उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश और बिहार पर पड़ सकता है।
  • शरणार्थियों का दबाव बढ़ सकता है।
  • चीन का प्रभाव बढ़ा तो भारत की सुरक्षा चिंताएं भी गहरी होंगी।

नतीजा

नेपाल आज एक ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा है। संसद और सुप्रीम कोर्ट का जलना केवल इमारतों का नष्ट होना नहीं है, यह जनता के गुस्से का प्रतीक है।

देश के युवा अब बदलाव चाहते हैं। लेकिन सवाल यही है कि क्या यह बदलाव सकारात्मक होगा या नेपाल को और अस्थिर कर देगा। आने वाले कुछ दिन और हफ्ते नेपाल के भविष्य की दिशा तय करेंगे।


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