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भारत और अमेरिका के बीच कॉर्न विवाद

भारत और अमेरिका के बीच कॉर्न विवाद

भारत और अमेरिका के बीच कॉर्न विवाद: क्या भारतीय बाज़ार में अमेरिकन मक्का को मिलनी चाहिए एंट्री?

static study team – Sitapur

भारत और अमेरिका के रिश्ते लंबे समय से उतार-चढ़ाव वाले रहे हैं। कभी रक्षा और ऊर्जा के मुद्दों पर सहयोग बढ़ता है तो कभी व्यापार और कृषि पर मतभेद सामने आते हैं। हाल ही में अमेरिका की तरफ से एक बड़ा बयान आया है जिसने भारत–अमेरिका संबंधों में एक नई बहस को जन्म दे दिया है। यह विवाद है अमेरिकन कॉर्न (मक्का) के भारतीय बाज़ार में प्रवेश को लेकर।

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अमेरिका चाहता है कि भारत उसकी कृषि उपज, विशेषकर कॉर्न, को बड़े पैमाने पर खरीदे। लेकिन भारत कई वजहों से अब तक इसके लिए तैयार नहीं है। सवाल यह है कि क्या भारत को अमेरिकी कॉर्न को अपने देश में एंट्री देनी चाहिए या नहीं?


अमेरिका का कॉर्न दबदबा

दुनिया में कॉर्न प्रोडक्शन की बात करें तो अमेरिका सबसे बड़ा खिलाड़ी है।

  • 2024-25 में अमेरिका ने लगभग 15 बिलियन डॉलर का कॉर्न एक्सपोर्ट किया।
  • मेक्सिको अकेले 5 बिलियन डॉलर से ज्यादा का अमेरिकी कॉर्न खरीदता है।
  • जापान, कोलंबिया, सऊदी अरब और चीन भी बड़े खरीदार हैं।

अमेरिका की कृषि अर्थव्यवस्था काफी हद तक एक्सपोर्ट पर आधारित है। खासकर कॉर्न और सोयाबीन अमेरिकी किसानों की रीढ़ माने जाते हैं। लेकिन जब से ट्रंप प्रशासन ने चीन पर टैरिफ लगाए, चीन ने अमेरिकी सोयाबीन और कॉर्न की खरीद कम कर दी। इससे अमेरिकी किसानों को भारी घाटा हुआ। कई किसान दिवालिया हुए और जमीनें तक बेचनी पड़ीं।

यही कारण है कि अब अमेरिका अपनी नजर भारत जैसे बड़े उपभोक्ता बाज़ार पर गड़ाए बैठा है।


भारत क्यों नहीं खरीदता अमेरिकी कॉर्न?

भारत अब तक अमेरिकी कॉर्न को खरीदने से बचता रहा है। इसके पीछे कई मजबूत कारण हैं:

1. भरोसे की कमी

अमेरिका ने बार-बार यह साबित किया है कि वह भरोसेमंद व्यापारिक पार्टनर नहीं है। कोई भी राष्ट्रपति आते ही पुरानी नीतियां बदल सकता है। भारत नहीं चाहता कि उसकी खाद्य सुरक्षा अमेरिकी निर्यात पर निर्भर हो जाए।

2. जेनेटिकली मॉडिफाइड (GMO) कॉर्न

अमेरिकी कॉर्न अधिकतर जेनेटिकली मॉडिफाइड होता है। भारत ने अभी तक केवल GMO कॉटन की अनुमति दी है।

  • GMO फूड के इंसानी शरीर पर प्रभाव पर लंबी अवधि की स्टडीज़ अभी पूरी नहीं हुई हैं।
  • भारत 1.4 बिलियन लोगों की सेहत को लेकर रिस्क नहीं लेना चाहता।
  • अलग-अलग नस्ल और देशों पर GMO का असर अलग हो सकता है।

भारत की रणनीति है “वेट एंड वॉच” यानी पहले देखो कि अमेरिका, ब्राजील और मेक्सिको में लंबे समय तक GMO खाने से क्या असर पड़ता है। उसके बाद ही कोई बड़ा फैसला लो।

3. आत्मनिर्भरता

भारत कॉर्न उत्पादन में काफी हद तक आत्मनिर्भर है।

  • कॉर्न का इस्तेमाल केवल खाने में नहीं बल्कि कॉर्नफ्लेक्स, सिरप, पोल्ट्री फीड और एथेनॉल बनाने में भी होता है।
  • भारत में उत्पादन घरेलू खपत को पूरा करता है।
  • केवल सूखा या पोल्ट्री फीड की डिमांड बढ़ने जैसी परिस्थितियों में थोड़ी कमी आती है, तब भारत गैर-GMO कॉर्न आयात करता है।

4. रणनीतिक कारण

भारत नहीं चाहता कि अमेरिका उसके कृषि बाज़ार में एंट्री ले और भविष्य में रणनीतिक दबाव बनाए। एक बार अमेरिकी कॉर्न भारत के फूड चेन का हिस्सा बन गया तो अमेरिका कभी भी एक्सपोर्ट रोककर भारत को दबाव में डाल सकता है।


अमेरिका की राजनीति और भारतीय बाज़ार

अमेरिकी किसानों का वोट रिपब्लिकन पार्टी के लिए अहम है। ट्रंप और रिपब्लिकन नेताओं पर दबाव है

कि वे किसानों के लिए नए बाज़ार खोलें। भारत, जिसकी आबादी 1.4 बिलियन है, उनके लिए “गोल्डन मार्केट” माना जाता है।

अगर अमेरिकी कॉर्न को भारत में एंट्री मिल जाती है तो ट्रंप इसे अपने चुनावी प्रचार में बड़ी उपलब्धि बताएंगे।

वे कहेंगे कि भारत जैसा बड़ा देश भी अब अमेरिकी कृषि उत्पाद खरीदने पर मजबूर है।


भारत–अमेरिका ट्रेड वार का एंगल

अमेरिका ने भारत पर कई टैरिफ लगाए हैं, जिनमें से कुछ 50% तक हैं। यह टकराव अब कॉर्न के मुद्दे से जुड़ गया है।

  • अमेरिका कह रहा है कि अगर भारत उनके कॉर्न को खरीदे तो टैरिफ कम किए जा सकते हैं।
  • भारत का मानना है कि ये टैरिफ अमेरिका का दबाव बनाने का तरीका है।

इससे साफ है कि कॉर्न विवाद सिर्फ कृषि का नहीं बल्कि व्यापक ट्रेड रिलेशन का हिस्सा है।


मेरा विश्लेषण: भारत को क्या करना चाहिए?

मेरे हिसाब से भारत को तीन बिंदुओं पर संतुलन बनाना होगा:

  1. खाद्य सुरक्षा:
    भारत को अपनी फूड चेन में अमेरिकी GMO कॉर्न को तुरंत एंट्री नहीं देनी चाहिए। यह भविष्य में गंभीर स्वास्थ्य संकट बन सकता है।
  2. रणनीतिक स्वायत्तता:
    भारत को यह समझना होगा कि अमेरिका कभी भी अपनी नीति बदल सकता है। अगर कृषि में निर्भरता बढ़ गई तो यह रणनीतिक कमजोरी होगी।
  3. व्यापार संतुलन:
    अगर अमेरिका टैरिफ घटाने का वादा करे तो भारत आंशिक और सीमित मात्रा में केवल नॉन-GMO कॉर्न खरीदने पर विचार कर सकता है। इससे रिश्ते भी मैनेज होंगे और स्वास्थ्य व सुरक्षा पर असर नहीं पड़ेगा।

जनता की राय क्यों अहम है?

यह मुद्दा केवल सरकार का नहीं बल्कि हर भारतीय नागरिक से जुड़ा है।

  • अगर GMO कॉर्न भारत आया तो 1.4 बिलियन लोग लंबे समय तक इसे खाएंगे।
  • आने वाली पीढ़ियों की सेहत और कृषि पर इसका गहरा असर होगा।
  • इसलिए इस विषय पर खुला डिबेट होना जरूरी है।

भविष्य का परिदृश्य

अमेरिका का दबाव आने वाले समय में और बढ़ेगा।

  • अगर भारत कॉर्न को अनुमति नहीं देता तो अमेरिका टैरिफ और बढ़ा सकता है।
  • अगर भारत आंशिक अनुमति देता है तो अमेरिकी कंपनियां धीरे-धीरे भारतीय कृषि मार्केट पर कब्जा करने की कोशिश करेंगी।
  • भारत को दीर्घकालिक सोच रखनी होगी।

भारत और अमेरिका के बीच कॉर्न विवाद एक साधारण व्यापारिक मामला नहीं है।

यह भारत की खाद्य सुरक्षा, कृषि नीति और रणनीतिक स्वायत्तता से जुड़ा मुद्दा है।

मेरी राय में भारत को अमेरिकी GMO कॉर्न को अनुमति नहीं देनी चाहिए।

अगर व्यापारिक दबाव बहुत बढ़े तो केवल सीमित मात्रा में नॉन-GMO कॉर्न खरीदा जा सकता है, वह भी अस्थायी जरूरत के समय।

भारत के लिए सही रास्ता यही होगा कि वह अपने किसानों को सशक्त करे और घरेलू उत्पादन बढ़ाए। यही दीर्घकालिक समाधान है।

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