PoK में मानवाधिकारों का हनन: पाकिस्तान की बर्बरता पर भारत ने की कड़ी निंदा, दुनिया के सामने किया पर्दाफाश 
PoK में विरोध प्रदर्शन और मानवाधिकार हनन की स्थिति”
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!नई दिल्ली: पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK), जिसमें गिलगित-बाल्टिस्तान भी शामिल है,
एक बार फिर सुलग रहा है। अपनी बुनियादी जरूरतों और अधिकारों के लिए सड़कों पर
उतरे निर्दोष नागरिकों पर पाकिस्तानी सुरक्षा बलों द्वारा की जा रही बर्बरता और
मानवाधिकारों के गंभीर हनन ने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा है। इस दमनकारी कार्रवाई
पर भारत ने अपनी चुप्पी तोड़ते हुए न केवल कड़ी निंदा की है, बल्कि पाकिस्तान को उसके
“भयानक मानवाधिकार उल्लंघनों” के लिए जवाबदेह ठहराने की भी मांग की है।
यह लेख इस पूरे मुद्दे की गहराई से पड़ताल करता है, ऐतिहासिक संदर्भों को खंगालता है,
और भारत की प्रतिक्रिया के भू-राजनीतिक महत्व को समझने का प्रयास करता है।
क्या है PoK का मौजूदा संकट? क्यों सड़कों पर हैं लोग?
पिछले कई दिनों से PoK के विभिन्न क्षेत्रों, विशेष रूप से मुजफ्फराबाद, मीरपुर और कोटली में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं।
यह विरोध प्रदर्शन ‘जम्मू-कश्मीर जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी’ (JKJAAC) के नेतृत्व में हो रहा है।
शुरुआत में यह आंदोलन आसमान छूती महंगाई, गेहूं के आटे पर सब्सिडी खत्म करने और
बिजली की दरों में भारी वृद्धि के खिलाफ शुरू हुआ था। लेकिन जल्द ही इसने एक बड़ा रूप ले लिया
और अब यह पाकिस्तान के दशकों पुराने दमन, राजनीतिक अधिकारों के अभाव
और क्षेत्र के संसाधनों की लूट के खिलाफ एक जन आंदोलन बन गया है।
प्रदर्शनकारियों की प्रमुख मांगें (38-सूत्रीय चार्टर):
- आर्थिक राहत: गेहूं के आटे और बिजली पर सब्सिडी तत्काल बहाल की जाए।
- संसाधनों पर अधिकार: क्षेत्र में उत्पन्न होने वाली पनबिजली परियोजनाओं से उत्पादित बिजली स्थानीय दरों पर उपलब्ध कराई जाए।
- राजनीतिक सुधार: विधानसभा में कश्मीरी शरणार्थियों के लिए आरक्षित 12 सीटों को खत्म किया जाए, क्योंकि स्थानीय लोगों का आरोप है कि इन सीटों का इस्तेमाल इस्लामाबाद विधानसभा को अस्थिर करने के लिए करता है।
- अभिजात्य वर्ग के विशेषाधिकारों का अंत: सरकारी अधिकारियों और राजनेताओं को मिलने वाले अनावश्यक भत्तों और सुविधाओं को समाप्त किया जाए।
- बुनियादी सुविधाएं: मुफ्त शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और सड़क जैसी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को पूरा किया जाए।
शांतिपूर्ण तरीके से शुरू हुए इन प्रदर्शनों ने तब हिंसक रूप ले लिया जब पाकिस्तानी रेंजर्स और पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर सीधे गोलीबारी की। रिपोर्टों के अनुसार, इस क्रूर कार्रवाई में 10 से अधिक नागरिक मारे गए हैं और सैकड़ों घायल हुए हैं। क्षेत्र में इंटरनेट और मोबाइल सेवाओं को पूरी तरह से बंद कर दिया गया है, जिससे वहां के हालात की पूरी जानकारी बाहर आना मुश्किल हो गया है।
भारत का कड़ा रुख: विदेश मंत्रालय का दो टूक बयान
इस गंभीर स्थिति पर प्रतिक्रिया देते हुए, भारतीय विदेश मंत्रालय (MEA) के प्रवक्ता, श्री रणधीर जायसवाल ने एक साप्ताहिक मीडिया ब्रीफिंग में भारत के कड़े रुख को स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि भारत ने PoK में हो रही घटनाओं का संज्ञान लिया है, जिसमें निर्दोष नागरिकों पर पाकिस्तानी बलों द्वारा की गई बर्बरता भी शामिल है।
“हमारा मानना है कि यह पाकिस्तान की दमनकारी नीति और उन क्षेत्रों से संसाधनों की व्यवस्थागत लूट का एक स्वाभाविक परिणाम है, जो उसके जबरन और अवैध कब्जे में हैं। पाकिस्तान को उसके भयानक मानवाधिकार उल्लंघनों के लिए जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए।” – रणधीर जायसवाल, प्रवक्ता, विदेश मंत्रालय
भारत की यह प्रतिक्रिया कई मायनों में महत्वपूर्ण है। पहला, भारत ने स्पष्ट रूप से इन विरोध प्रदर्शनों को पाकिस्तान की “दमनकारी नीति” का परिणाम बताया है, न कि किसी बाहरी उकसावे का। दूसरा, भारत ने “संसाधनों की लूट” का मुद्दा उठाकर उस आर्थिक शोषण को उजागर किया है जो पाकिस्तान पिछले 75 वर्षों से इन क्षेत्रों में कर रहा है। तीसरा, भारत ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से पाकिस्तान को “जवाबदेह” ठहराने की मांग की है, जिससे इस मुद्दे का अंतर्राष्ट्रीयकरण करने का संकेत मिलता है।
ऐतिहासिक संदर्भ: अवैध कब्जे और शोषण की कहानी
PoK का मुद्दा 1947 में भारत के विभाजन के समय से ही जटिल रहा है। महाराजा हरि सिंह के भारत में विलय के फैसले के बावजूद, पाकिस्तानी सेना ने कबायलियों की आड़ में इस क्षेत्र पर आक्रमण कर एक बड़े हिस्से पर अवैध कब्जा कर लिया था। तब से लेकर आज तक, पाकिस्तान ने इस क्षेत्र को ‘आजाद कश्मीर’ का भ्रामक नाम देकर दुनिया को गुमराह करने की कोशिश की है, जबकि वास्तविकता यह है कि यह क्षेत्र सीधे पाकिस्तानी सेना और खुफिया एजेंसियों के नियंत्रण में है।
शोषण के विभिन्न पहलू:
- प्राकृतिक संसाधनों की लूट: PoK, विशेषकर गिलगित-बाल्टिस्तान, जल संसाधनों से समृद्ध है।
- पाकिस्तान ने यहां बड़े-बड़े बांध (जैसे मंगला और डायमर-भाषा बांध) बनाए हैं, जिनसे पैदा होने
- वाली बिजली पाकिस्तान के पंजाब प्रांत को रोशन करती है, जबकि स्थानीय लोग खुद बिजली कटौती
- और महंगी दरों से जूझ रहे हैं।
- जनसांख्यिकीय परिवर्तन: पाकिस्तान पर व्यवस्थित रूप से PoK की जनसांख्यिकी को बदलने का आरोप लगता रहा है।
- बाहर से लोगों को लाकर यहां बसाया जा रहा है ताकि स्थानीय शिया और अन्य समुदायों को अल्पसंख्यक बनाया जा सके।
- राजनीतिक दमन: इस क्षेत्र के लोगों को अपने राजनीतिक विचार व्यक्त करने की स्वतंत्रता नहीं है।
- जो कोई भी पाकिस्तान बिद्रोह के कब्जे के खिलाफ या भारत के पक्ष में आवाज उठाता है,
- उसे के आरोपों में जेल में डाल दिया जाता है, प्रताड़ित किया जाता है या गायब कर दिया जाता है।
- आतंकवादी शिविर: पाकिस्तान ने PoK का इस्तेमाल भारत में आतंकवाद फैलाने के लिए एक लॉन्चपैड के रूप में किया है। यहां पर लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे आतंकवादी संगठनों के शिविर चलाए जाते हैं, जो स्थानीय युवाओं को गुमराह करते हैं और क्षेत्र की अस्थिरता को बढ़ाते हैं।
अंतर्राष्ट्रीय प्रतिक्रिया और भू-राजनीतिक निहितार्थ
PoK में बिगड़ती स्थिति पर अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चिंता व्यक्त की जा रही है।
यूनाइटेड किंगडम की एक संसदीय समूह (APPG) ने ब्रिटिश सरकार को पत्र लिखकर इस मामले पर अपनी
“गंभीर चिंता” व्यक्त की है और इस्लामाबाद के साथ इस मुद्दे को उठाने का आग्रह किया है।
जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC) के सत्र के दौरान भी
PoK और गिलगित-बाल्टिस्तान के राजनीतिक कार्यकर्ताओं ने पाकिस्तान द्वारा मौलिक अधिकारों के हनन का मुद्दा उठाया है।
भारत की मुखर प्रतिक्रिया के बाद इस मुद्दे पर वैश्विक दबाव बढ़ने की संभावना है।
यह पाकिस्तान के उस दोहरे चरित्र को भी उजागर करता है जो एक तरफ कश्मीर में मानवाधिकारों की बात करता है
और दूसरी तरफ अपने कब्जे वाले क्षेत्र में लोगों पर गोलियां बरसाता है। भारत का यह रुख उसकी उस नीति का हिस्सा है
जिसके तहत वह PoK को भारत का अभिन्न अंग मानता है और वहां के लोगों के अधिकारों की रक्षा करना अपना कर्तव्य समझता है।
निष्कर्ष: न्याय और अधिकार की लड़ाई
PoK में हो रहा जन आंदोलन केवल बिजली या आटे की लड़ाई नहीं है;
यह पहचान, सम्मान, न्याय और अपने भविष्य का फैसला खुद करने के अधिकार की लड़ाई है।
पाकिस्तानी सेना की गोलियां और दमनकारी नीतियां शायद अस्थायी रूप से इस आवाज को दबाने की कोशिश करें,
लेकिन यह उस चिंगारी को बुझा नहीं सकती जो अब एक मशाल बन चुकी है।
भारत द्वारा इस मुद्दे को जोरदार तरीके से उठाना न केवल PoK के लोगों को एक नैतिक समर्थन प्रदान करता है,
बल्कि पाकिस्तान पर भी कूटनीतिक दबाव बनाता है कि वह अपने अवैध कब्जे वाले क्षेत्रों में मानवाधिकारों का सम्मान करे।
अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस गंभीर मानवीय संकट पर कब तक
अपनी चुप्पी साधे रखता है और पाकिस्तान को उसकी बर्बरता के लिए कब जवाबदेह ठहराया जाता है।
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC) की रिपोर्टों के अनुसार…
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