अमेरिका vs भारत-जर्मनी: ट्रंप की टेरिफ पॉलिसी से क्यों बिगड़ रहा ग्लोबल बैलेंस?
प्रस्तावना
नमस्कार दोस्तों, स्वागत है अप सभी का स्थैतिक स्टडी कि एक और नई पोस्ट अमेरिका vs भारत-जर्मनी में आज हम बहुत ही अहम् टोपिक पर बात करने वाले है ………..
इतिहास के पन्ने पलट कर देखें तो हमेशा से दुनिया दो हिस्सों में बंटी रही है —
एक तरफ ग्लोबल नॉर्थ यानी यूरोप और अमेरिका जैसे विकसित देश।
दूसरी तरफ ग्लोबल साउथ यानी भारत, अफ्रीका और बाकी विकासशील देश।
लेकिन इस बार कुछ अलग हो रहा है।
डोनाल्ड ट्रंप की आक्रामक नीतियों ने न सिर्फ भारत बल्कि यूरोप जैसे देशों को भी अमेरिका से दूर करना शुरू कर दिया है।
कल ही जर्मनी ने खुले मंच पर भारत का साथ देकर ये साफ कर दिया कि अब ग्लोबल नॉर्थ भी अमेरिका की बुलिंग से परेशान है।
तो आखिर ये पूरा मामला है क्या?
जर्मनी क्यों भारत के साथ खड़ा है?
ट्रंप की टेरिफ पॉलिसी का असर भारत, यूरोप और पूरी दुनिया पर कैसे पड़ेगा?
आइए, इस आर्टिकल में हम डिटेल में समझते हैं।
अमेरिका vs भारत-जर्मनी
ट्रंप की टेरिफ पॉलिसी – हथियार बनी ट्रेड वॉर
- ट्रंप ने अपने कार्यकाल में ट्रेड को हथियार बना लिया है।
- भारत पर 50% तक टेरिफ लगा दिया गया है।
- अमेरिका का तर्क है कि भारत रूस से ऑयल खरीदकर वेस्टर्न सैंक्शन को तोड़ रहा है।
- असली मकसद है – अमेरिकी नौकरियों और इकोनॉमी को बचाना।
लेकिन इसका नुकसान क्या है?
- ग्लोबल सप्लाई चेन टूट रही है।
- डेवलपिंग देशों की ग्रोथ स्लो हो रही है।
- और सबसे बड़ी बात – अमेरिका की क्रेडिबिलिटी कम हो रही है।
जर्मनी का भारत को सपोर्ट
जर्मनी के डिप्टी एंबेसडर ने साफ कहा:
👉 “ट्रंप की टेरिफ पॉलिसी फ्री ट्रेड के खिलाफ है।”
क्यों सपोर्ट कर रहा है जर्मनी?
- फ्री ट्रेड का चैंपियन – जर्मनी की पूरी इकोनॉमी एक्सपोर्ट पर टिकी है।
- ऑटोमोबाइल
- मशीनरी
- केमिकल्स
अगर टेरिफ बढ़ेंगे तो सीधे जर्मनी की जीडीपी पर असर होगा।
- इंडिया एक बड़ा मार्केट –
- जर्मनी जानता है कि भारत के साथ रिश्ते मजबूत करने से उसे विशाल कंज्यूमर मार्केट मिलेगा।
- चाइना के विकल्प के तौर पर इंडिया मैन्युफैक्चरिंग में उभर रहा है।
- जियोपॉलिटिकल स्ट्रेटजी –
- यूरोप की इंडो-पैसिफिक स्ट्रेटजी में भारत अहम रोल निभाता है।
- अमेरिका की अनप्रिडिक्टेबल पॉलिसी से तंग आकर जर्मनी भारत के करीब आना चाहता है।
यूरोप और इंडिया – नया गठबंधन?
- यूरोपियन यूनियन और इंडिया के बीच फ्री ट्रेड एग्रीमेंट फाइनल स्टेज पर है।
- अगर ये साइन हो जाता है तो दोनों की इकोनॉमी को बूस्ट मिलेगा।
- जर्मनी यहां लीडर की भूमिका निभा रहा है।
मतलब साफ है – जर्मनी सिर्फ डिप्लोमैटिक शिष्टाचार नहीं निभा रहा, बल्कि एक स्ट्रेटेजिक अलायंस बना रहा है। अमेरिका vs भारत-जर्मनी
पीएम मोदी और ट्रंप का तनाव
खबर ये भी आई कि पीएम मोदी ने ट्रंप की चार कॉल उठाने से मना कर दिया।
ये क्यों हुआ?
- ट्रंप का नेगोशिएशन स्टाइल – छोटी कॉल करके अपनी जीत घोषित कर देना।
- मोदी सरकार को डर था कि ट्रंप अचानक कह देंगे कि भारत ने अमेरिकी शर्तें मान लीं।
- भारत ने साफ कर दिया – हम धमकी में नहीं आने वाले।
एस. जयशंकर का बयान भी इसी लाइन पर था:
👉 “अगर आपको रूस से हमारा ऑयल खरीदना पसंद नहीं है, तो आप हमसे रिफाइंड ऑयल क्यों खरीदते हैं?”
अमेरिका की गिरती साख
- ट्रंप की बार-बार बदलती नीतियों ने अमेरिका को जीरो क्रेडिबिलिटी पर ला दिया है।
- जर्मनी जैसे नज़दीकी अलायंस अगर पब्लिकली अमेरिका के खिलाफ बोल रहे हैं तो सोचो हालात कितने गंभीर हैं।
- बाकी देश – वियतनाम, ब्राज़ील, अफ्रीका, यहां तक कि यूरोप – सब नाराज़ हैं।
क्या बनेगा नया ब्लॉक?
भविष्य में ये सिनेरियो भी संभव है:
👉 अमेरिका बनाम बाकी दुनिया
- भारत, चीन, रूस, अफ्रीका और यूरोप एक साथ खड़े हो सकते हैं।
- इससे ग्लोबल ट्रेड और पावर बैलेंस पूरी तरह बदल जाएगा।
भारत की पोज़िशन – मजबूती की तरफ
- जर्मनी का सपोर्ट भारत को डिप्लोमैटिक वैलिडेशन देता है।
- ग्लोबल साउथ की आवाज़ और बुलंद हो रही है।
- अमेरिका के खिलाफ भारत की बार्गेनिंग पावर अब पहले से कहीं ज्यादा है।
निष्कर्ष
इस पूरे घटनाक्रम से तीन बड़ी बातें निकलती हैं:
- अमेरिका की बुलिंग पॉलिसी अब काम नहीं कर रही।
- भारत ग्लोबल साउथ का असली लीडर बनकर उभर रहा है।
- जर्मनी और यूरोप भारत के साथ नए ट्रेड और स्ट्रेटेजिक रिश्ते बना रहे हैं।
भविष्य में हो सकता है कि दुनिया एक नए गठबंधन की ओर बढ़े —
जहां अमेरिका अकेला खड़ा हो और बाकी देश मिलकर फ्री ट्रेड और मल्टीलैटरलिज्म को आगे बढ़ाएं।
✍️ लेखक: स्टैटिक स्टडी टीम ;-मनोज कुमार {सीनियर जौर्नालिस्ट } , अजीत मिश्रा {जूनियर जौर्नालिस्ट },अर्पित तिवारी {एडिटर-इन-चीफ }
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